Sharabi Shayari

महफ़िल की ये शाम ऐसे शांत क्यूँ हो गई साहब

क्या मेरे शायर दोस्तों 
कलम की श्याही ख़त्म हो गई 

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मोहब्बत से गुजरा हूँ अब मयख़ाने में जाना है

दोनों का असर एक ही है बस होश ही तो गंवाना है

Sharabi Shayari

जो सुरूर है तेरी आँखों में वो बात कहां मैखाने में
बस तू मिल जाए तो फिर क्या रखा है ज़माने में

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